बादलों में घर

चार साल पहले बेटे का नाशिक में इंजीनियरिंग में admission कराने जा रहा था । इगतपुरी की पहाड़ी पर था । जून 2011 का आखिरी सप्ताह था । बारिश हो रही थी । मैं गाड़ी चला रहा था । धुंध ही धुंध । आसमान के बादल जमीन पर उतर आए थे । पहाड़ी को छू रहे थे बादल । हाथों को चूम रहे थे बादल । मेरा पहाड़ों से मोह रहा है । 5 साल विद्यालय जीवन नैनीताल में बीता है । 5 पल में लोग दिल चुरा ले जाते हैं । 5 साल बहुत होता है । मैं पहाड़ों को अपना दिल हार आया था । आज फिर याद आ गई । जब बेबी की माँ को ब्याह के लाया था तो उससे पूछा था कि क्या चाहिए । पागल थी । बोली कि बादलों में घर चाहिए । मैं तब अति गरीब था । केवल वादे कर सकता था । सो वादा कर लिया । वादा याद रहा । आज ईश्वर के दिए दो पैसे पास में थे । उधर ही एक कॉलोनी बन रही थी । मुंबई में इसे second home कहते हैं । कॉलोनी का नाम था – fog city. गाड़ी मोड़ ली । कुछ जादा बात नहीं की । बात करने को था ही नहीं । पहाड़ों से मेरा मोह और पत्नी के बादलों में घर वाला वादा ही बहुत था । चाह तो थी कि उसे बादलों में बंगला दूं पर पास में दो पैसे ही थे इसलिए मन से समझौता करके 2BHK फ्लैट बुक कर दिया । अगले रविवार को बेटा, बेटी और उसकी माँ को वहां ले गया और दिखाया । सब खुश हो गए ।

my-home-in-cloud

चार वर्ष यूँ ही बीत गए । पता ही न चला । कल गुड़ी पाडवा का दिन । नवरात्रि का प्रथम दिवस । fog city से फोन आया कि आप का फ्लैट तैयार है । मैं और पत्नी गए । बिल्डर ने डिनर रखा था । सब से मिले भोजन किया और पत्नी जी को ‘उसके बादलों वाला घर’ सौंप दिया ।

हे ईश्वर, धन्यवाद !

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