मेरी बेटी मेरी खुशी है

जब मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ और खोजता हूँ खुशी कहां से आई, तो पाता हूँ कि खुशी बेटी से आई. बात पुरानी है. 16 साल पुरानी. तब हम संघर्ष कर रहे थे. किसी और से नहीं, अपने से ही संघर्ष कर रहे थे. रहने के लिए 10 x 10 की छत तो मिल गई थी पर उसके EMI का महीना दर महीना संघर्ष था, काम में स्थाई होने का संघर्ष था, आमदनी बढ़ाने का संघर्ष था, कुछ कर दिखाने का संघर्ष था, और इन सब के ऊपर ईमानदार बने रहने का संघर्ष था.

बात अगस्त 1998 की है. पत्नी प्रेग्नेंट थी. बेटी को इस दुनिया में आने दो तीन महीने थे. मैं इंजीनियरिंग कॉलेज में कंप्यूटर डिपार्टमेंट का HOD था. हर आर्गेनाइजेशन कि तरह यहां भी आतंरिक राजनीति थी. और राजनीति में कोई भी शिकार हो सकता है. इस बार मैं और मेरा दोस्त प्रो. वधाई शिकार बन गए. हमने इस्तीफ़ा दे दिया.

शाम को घर पंहुच कर बताया. पत्नी घबड़ा गई. उसके लिए यह शॉक था. मैंने उसे समझाया कि घबड़ाने की बात नहीं है. मैंने इससे पहले भी बहुत उतार चढ़ाव देखे थे इसलिए दिल मजबूत था. संघर्ष से मुझे डर नहीं लगता था. इसलिए अगले संघर्ष के लिए मैं तैयार हो गया. मन खट्टा हो गया था. सोच लिया था कि अब नौकरी नहीं करूंगा. सैलरी नहीं लूँगा. सैलरी दूंगा.

दो दिन बाद, एक मित्र के सुझाव पर, इंजीनियरिंग की कोचिंग क्लासेस चालू करने का फैसला किया. self employment का मुझे अनुभव था. उसकी कठिनाइयों से भली भांति परिचित था. काम चालू हुआ. 10 x 12 का कमरा किराए पर लिया. एक ब्लैक बोर्ड लगाया. 30 प्लास्टिक की कुर्सी डाली. घर में पड़ी छोटी टेबल  डाली. और गणेश जी को फूल अर्पण किए.

मैं स्वयं सुबह 4 बजे उठ जाता था. 5 बजे से अपने हाथ से छोटे छोटे पोस्टर लेकर जगह जगह चिपकाता था. 8 बजे तक किसी इंजीनियरिंग कॉलेज के सामने पहुंच जाता था और पेम्पलेट बांटता था. 10 बजे क्लास में होता था. लेक्चर लेता था. दूसरे काम करता था. रात के 10 बजे वापस घर पहुंचता था. व्यस्तता वही रही. अभी भी बेटी की माँ कहती है कि अस्पताल में जब बेटी आई  तो आप क्लास के काम में बिजी थे.

मेरी बेटी मेरी खुशी है

मेरी बेटी मेरी खुशी है

अक्टूबर में बेटी आई. और यकीन मानिए, खुशी आई. क्लास में 30 कुर्सियां कम पड़ पड़ने लगी. और अगले एक साल में हमारे पास छोटे बड़े 7 क्लास रूम थे, मुंबई के नामी प्रो. वकील थे, उनके अलावां 25 visiting प्रोफेसर थे, 6 full time स्टाफ़ थे, और कम से कम 1000 विद्यार्थी हमसे, कुछ न कुछ, पढ़ कर जा चुके थे.

मैं क्यों न कहूँ, मैं कहूँगा –

मेरी बेटी मेरी खुशी है !

Love you बेटी. 

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