और, मैं उनमे समा गई, हमेशा के लिए !

कितने बरस बीत गए इस बात को …

ये कैसी सब्जी उठा लाये आप ? आपको तो खरीदारी की ज़रा सी भी अक्ल नहीं है |
बस .. इतना कहना था कि घर में भूचाल आ गया |

इन्होंने इतनी जोर से मेज पर मुक्का मारा कि सारी सब्जी तितर -बितर हो गयी |
यानि कि क्या कहना चाहती हो तुम ? मुझे सब्जी खरीदने की अक्ल नहीं है ?
अक्ल का सारा ठेका तुम्हारे खानदान ने ले रक्खा है क्या ?

कलेजा धक् से हो गया |
हे भगवान् ! ऐसा क्या कह दिया मैंने ?
कहने भर को सब्जी मंडी जाते हैं और पैसे और झोला ड्राईवर को थमा देते हैं , आ गयी सब्जी |
खैर !!!

नाश्ता लगाया तो परे सरका दिया और भूखे ही दफ्तर चले गए |
ओहो हो हो ! बनाना तो इन्हें चाय के सिवा कुछ आता नहीं और भूखे ये जरा सी देर भी रह नहीं सकते
… और तेवर तो देखो जरा … चले गए गुस्से में जनाब |

 

roothi_rahi

दोपहर में बड़े चाव से इनकी पसंद की धुली उड़द की दाल और भरवाँ करेले बनाए |
अमूनन सलवार सूट ही पहनती हूँ घर में , पर आज शिफ़ान की साड़ी निकाल ली |
सोचा कि आज शाम को इन्हें दफ्तर जाने ही नहीं दूंगी ,
एक वेणी भी खरीदकर लाऊंगी इनके साथ जाकर और कहूँगी ..खुद ही लगाइए अपने हाथों से हाँ …..
चोटी बनाती जाती थी और मन ही मन मुस्कुराती जाती थी कि दरवाजे की घंटी बजी |
दौड़कर गयी तो इनका चपरासी मंगतू खड़ा था और कह रहा था — साहब ने कहला भेजा है कि आज खाना खाने नहीं आयेंगे …..
चरररधम !!!

मैं तो फटी फटी आँखों से उसे देखती ही रह गयी और वो ????
दांत फाड़कर मुस्कुरा रहा था कमीना |
मुझे इतना गुस्सा आया कि क्या कहूँ , महीने के अंत में हमेशा पैसे मांगने आ जाता है मरदूद कि मेमसाहब ! क्या करें पूरा ही नहीं पड़ता और मैं भी बेवकूफों की तरह हमेशा पैसे दे देती हूँ इसे | इस बार आएगा तो झाडू मारूंगी इसके सर पर |

सारा खाना यूँ ही पड़ा रह गया और आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे |
हाय राम ! सियाराम ड्राईवर कैंटीन के सड़े हुए समोसे खिला रहा होगा इन्हें |

शाम हुई तो नयी आशा से इनके मनपसंद कटलेट बनाए ,साथ में चिप्स |
समझ गयी थी इसलिए सामने नहीं आई , चुपचाप नाश्ता लगाकर हट गयी |
छिप के देखा , इन्होंने उड़ती सी नजर नाश्ते पर डाली फिर जूते के फीते खोलने लगे |
अलमारी से कुरता -पायजामा निकाल कर देना चाहा तो इन्होंने इशारे से कह दिया कि रहने दो |
उन्हीं दिनों जया भादुरी की ‘कोरा कागज ‘ रिलीज हुई थी |
शाम का दीपक जलाते हुए होंठ कह रहे थे — ओम जय जगदीश हरे ..
और मन गा रहा था — रूठे रूठे पिया मनाऊं कैसे ….
रात का खाना क्या था पूरे भोज की तैय्यारी थी जैसे |
खाना खाकर मुंह फेर कर लेट गए ये तो |

हे भगवान् !!!
इतनी उपेक्षा ???
ऐसा तो कभी नहीं हुआ कि दिन का झगड़ा रात को सुलट न गया हो |
ड्राइंगरूम की लड़ाई बेडरूम तक ले जाना तो इनका स्वभाव नहीं , फिर ???
भगवान् !!
बार बार हिचकियाँ गले तक आ आकर लौट रही थीं |
आँखें मूंदे मूंदे ही आभास हुआ कि इन्होंने मेरी तरफ करवट ले ली है |
दम साधे पड़ी रही , आँखें खोलने की हिम्मत नहीं हुई |

थोड़ी देर बाद अपने बालों पर इनके हाथ का स्पर्श महसूस हुआ |
सुन रही हो !
सुबह ही बॉस से जबरदस्त चख चख हो गयी थी फोन पर और सारा गुस्सा तुम पर निकल गया ..अब माफ़ कर दो प्लीज !
कितना समुन्दर इकठ्ठा था भीतर जो बाहर आने को जाने कब से बेताब था ,अब जो बांध टूटा तो न जाने कितने नदी नाले बह निकले |
दुष्ट मन ने कहा कि नखरा करने का यही सही वक्त है पर आत्मा से आवाज आई –सोने की थाली स्वयं चलकर तेरे द्वार तक आई है , ठुकराना मत |

और, मैं उनमे समा गई, हमेशा के लिए !

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