मेरी बुआ

(1)

जब मैंने लिखना सीखा ‘क ‘ माँ ने सिखाया ‘क’ से कमला …कमला मतलब मेरी बुआ । तीन बुआ में सबसे बड़ी । है भी बड़ी, बड़े दिल वाली, बेहद मीठी, शूगर कैण्डी। उम्र होगी उनकी 75 के आस -पास । रंगत गोरी और लाल । उम्र का एक लंबा सफर तय किया है उन्होंने पर आज तलक उनके चेहरे पर कभी गुस्से की लाली नहीं देखी । उनकी बोली में खालिस शहद है । बहुत सब्र है उनमें । रोज़ मायके -ससुराल सब की खैर- खबर लेना । पूरे परिवार को प्यार से एक माला में पिरो कर रखना । यही उनकी खासियत है । नहीं जानती कि कहाँ से भर कर लाती हैं वो प्यार का अमृत -घट कि पूरे खानदान पर उड़ेलती जाती हैं । मेरी कम्मो बुआ हल दिल अज़ीज़ हैं । मुझे याद है जब मैं छोटी थी बुआ बनारस में रहती थीं । वो जब तक वहाँ रहीं मेरे हर जन्मदिन पर इलाहाबाद आती थीं । हर केक के साथ मेरी और बुआ की तस्वीरें हैं । लोग कहते हैं मैं बुआ जैसी दिखती हूँ पर मैं बुआ सरीखी बिल्कुल नहीं ।

(2)

कृष्णा बुआ मेरी दूसरी बुआ । एकदम नफ़ीस । साफ -सफाई पसंद । माँ बताती हैं, वो शुरू से ऐसी हैं बिस्तर पर सलवट न पड़ने देना। फूल- पौधों के एक -एक पत्ते पर पड़ी धूल को अपने हाथ से साफ करना । माँ बताती हैं कि वो शुरू से स्टाइलिश । उनके शादी से पहले के दिनों में चाहे उनके पास चार -पाँच ही सूट हों , पहनती थीं वो उन्हें कड़क प्रेस और कलफ करके । उनकी शादी ऊँचे घर में हुई । पति की टाॅप फेवरिट ।गहनों और साड़ियों से लक -दक । जब इलाहाबाद मायके आतीं और हमारे घर के फर्श पर बैठतीं, साड़ियों के नग निकल कर फर्श पर गिरते । मैं अपनी नन्ही हथेलियों में उन्हें सहेज कर रख लेती । उनके झुमके …तोते के पिंजरे…. मेरा दिल उनमें अब भी कैद है । बुआ की उम्र होगी अब 65 … ज़िन्दगी के सफ़र में उन्होंने बहुत सुख -दुख देखे पर मैंने आज तलक उन्हें जीवन से शिकायत करते नहीं देखा । हर हाल में मुस्कराने वाली जिन्दादिल बुआ की मुझ पर छाप है … पर मैं बुआ जैसी तो हूँ ही नहीं ।

(3)

तीसरी बुआ बेबी बुआ । सब भाई -बहनों में छोटी। सुंदर नैन -नक्श वाली । नाम सरोज । अब है 60 बरस की पर अब भी सबकी बेबी। तीन बेटों की माँ । जब 42 की भी नहीं थीं कि असमय पति चले गए।इस खबर से सकते में सारा खानदान था । रोने के लिए बुआ का सारा जीवन पड़ा था और काम थे कि ढेर तमाम । लम्बा-चौड़ा बिजनेस , जवान होते बेटे । सबको संभालना था । उसने खुद के आँसु पोछे । पति को विदा किया और सारी हिम्मत जुटा कर खड़ी हो गई । रिश्ते -नाते घर में बैठकर जाने वाले का अफसोस करते रहे और वो थी कि बस काम करती रही । घर -बाहर संभालती रही । तीन बेटों की प्यारी माँ, तीन लाडली बहुओं की सास है । समय बीतता रहा आज घर पोते-पोतियों से रौशन है । समाज में बुआ की अपनी पहचान है । लुधियाना शहर के सम्भ्रान्त वर्ग में उसकी गिनती है । बेबी नहीं वो शेरनी हैै । उसके हौसले को मेरा सलाम है । लहू एक ही है हम दोनों में पर बुआ मेरी तो class है ।

– रुचि

[ बचपन की डायरी के पन्ने ]

रूचि भल्ला लेखिका

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