मेरे फूफा

मेरी तीन बुआ । तीनों  प्यारी । बहुत प्यारी । और तीन फूफा । एक से बढ़ कर एक ।

(1)

सरदार जोगिंदर सिंह ….खूबियाँ इतनी कि उँगलियों पर गिननी मुश्किल … खुदा ने रंगत बख्शी लाल-गुलाबी । चेहरे पर दी मुस्कुराहट 24 x 7 वाली। दिल सोने सा खरा दिया ।

बात सालों पुरानी … मेरी दादी के पड़ोस वाले घर में उनका जन्म हुआ । दादी की सहेली उनकी माँ । दादी कहतीं वो जब पैदा हुए जैसे मक्खन का पेड़ा , फिर जब कम्मो बुआ का जन्म हुआ … तो दोनों सहेलियों ने मिल कर इनकी कुड़माई कर दी। इस तरह मक्खन और मलाई की सगाई हो गई । वक्त अपने समय से चलता रहा और बड़े होने पर इन दोनों का ब्याह हो गया । इनका घर ऐसा जहाँ सिर्फ प्यार का दरिया बहता । इनके अपने घर का रिवाज़ … जितने भी cousins हों … उन्हें भाई-बहन ही माना जाए cousin जैसे शब्द की वहाँ कोई गुंजाइश नहीं ।

वक्त बीता ….उस घर में कोई किलकारी नहीं सुनाई दी और फिर वो अपनी प्यारी बगीची में एक बच्ची फूल सी ले आए और उस फूल को वे दोंनो सींचते रहे तन -मन -धन से । उस फूल सी परी में उनकी जान बसती है । वो दुनिया में प्यार बाँटने आए हैं ।

अपने घर-परिवार के बराबर उन्होंने कम्मो बुआ के मायके पर भी प्यार लुटाया। वो बुआ के भाई-बहनों की जान हैं। वो जब भी अपनी ससुराल के लोगों से मिलने जाते हैं … बस…वहाँ रमता जोगी बन जाते हैं ।

80 बरस की उम्र हो गई उनकी … उन्होंने जिसमें भी देखा सिर्फ गुण देखा …दोष किसी में भी उन्हें कभी नज़र नहीं आता । वो सरदार हैं पर उनके ड्राॅइंग -रूम की एक शेल्फ में सारे भगवान तस्वीर में दिख जाएंगे … एक तस्वीर में अल्लाह लिखा हुआ … एक में ईसा उनके साथ शिवा और दुर्गा माता भी । वे सब धर्मों का आदर करते हैं ।

life में उनका motto रहा eat, drink & be merry… उस खुशमिजाज शख्सियत को मैंने कभी उदास नहीं देखा … कैंसर जैसे असाध्य रोग से वो हँस कर लड़ रहे हैं … तबियत पूछे जाने पर अपनी वही 24 x 7 वाली प्यारी मुस्कान बिखेरते हुए कहते हैं … fit हूँ… One piece हूँ …
ऐसे हैं हमारे जोगी बाबा ……..

(2)

उनका नाम केवल कृष्ण … शादी हुई मेरी बुआ कृष्णा से और कृष्ण फिर हो गए कृष्णा के ‘made for each other’.

केवल कृष्ण … रंगत भी नाम सी … पक्का साँवला रंग । दिखने में खूबसूरत … स्टाईल में ए-वन … English में कहा जाए … तो Tall Dark Handsome । सोने के फ्रेम का चश्मा लगाते और कपड़े पहनते एकदम क्रिस्प । एक हाथ में Solitaire जड़ी अंगूठी दूसरे हाथ में क्रिस्टल -ग्लास। वो जब तक जिए King style जिए ।

बुआ को उन्होंने देश -विदेश की खूब सैर करायी । कभी- कभी ऐसा होता कि वो बुआ को इलाहाबाद मायके जाने की टिकट तो करा देते पर जब स्टेशन से गाड़ी छूटने लगती वो चलती गाड़ी से बुआ का हाथ खींच लेते …फिर क्या …गाड़ी आगे बढ़ जाती और बुआ वापस अपने घर ।

(3)

परमजीत … सबके परम प्रिय … प्यार से पम्मी । चेहरा ऐसा कि लोग कहते फिरोज़ खान । शान्त – कोमल सा भाव हर वक्त उस चेहरे पर रहता । उम्दा शख्सियत थे । व्यवहारिक बुद्धि रखने वाले बेहद दूरदर्शी । आज को संजो कर रखने वाले, आने वाले कल के लिए । अपने श्रम और कौशल से उन्होंने अपने पिता का कारोबार बढ़ाया और समाज में अपना एक नाम बनाया ।

ऐसे ही तरक्की के दिनों में सोने की एक मटरमाला उन्होंने खरीदी …मेरी बेबी बुआ बताती थीं वो हर साल उसमें एक मनका सुनार से डलवाते जाते… वे पूँजी को जमा करते रहे । शायद उन्हें आभास हो गया था कि उनकी मधुमेह की बीमारी मौत बन कर कभी भी दस्तक दे सकती है इसलिए श्रम से कमाए धन को संचित करते रहे अपनी बीवी के लिए और बच्चों के सुखद भविष्य के लिए…

– रुचि ( मेरी डायरी से….. )

Ruchi Bhalla Writer


 

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