मेहनत की कमाई का सुख

“संजय, ये वाली जींस भी फेंक दूं क्या?”
“नहीं, एक बार सूटकेस को फिर से तोलो, क्या पता अब सूटकेस का वज़न ठीक हो गया हो।”
“पर मुझे लगता है कि अभी भी सूटकेस का वज़न कम से कम चार किलो अधिक है।”
“यार, ये वाली जींस मैंने अभी तो खरीदी है। अरमानी की जींस ऐसे ही फेंक दूं?”
“सोच लो। जींस नहीं तो इस टेपरिकॉर्डर को सूटकेस से निकाल देते हैं।”
“अरे, क्या कर रही हो? ये टेपरिकॉर्डर इंडिया में नहीं मिलता। अब ऐसे टेपरिकॉर्डर बनते ही नहीं।”
***
इस बातचीत में एक भी शब्द मैंने अपनी तरफ से नहीं जोड़ा है। यह करीब दस साल पहले अमेरिका के डेनवर शहर के हमारे घर में मेरी और मेरी पत्नी के बीच हुई बातचीत का हिस्सा है। हमने तय कर लिया था कि अब हम अमेरिका से भारत चले जाएंगे और अपना सूटकेस तैयार कर रहे थे। हमें मालूम था कि हवाई जहाज में तय सीमा से अधिक वजन लेकर चलने पर बहुत जुर्माना भरना पड़ता है। हमारे पास पहले से ही तय सीमा से अधिक सामान हो चुका था और अब हम छोटी-छोटी चीजों को निकाल कर किसी तरह उसकी भरपाई कर रहे थे। सूटकेस का वज़न कितना है, यह देखने के लिए हम घर पर इलेक्ट्रानिक तराजू खरीद लाए थे, जिसे साथ लाने का मेरा बहुत मन था, पर मैं जानता था कि तीन किलो का वह तराजू साथ लाना उस तराजू की कीमत से कहीं अधिक का पड़ता।

हमने ढेर सारे ऊनी कपड़े, चादरें, खिलौने, इलेक्ट्रानिक चीजें, जूते निकाल फेंके थे। ये सारी वो चीजें थीं, जिन्हें हमने बहुत मन से खरीदा था और जतन से संभाल कर रखा था। उन दिनों भारत में ये सारी चीजें आसानी से नहीं मिलती थीं, इसलिए हमने तय किया था कि जब कभी हम भारत जाएंगे, तो सारी चीजें साथ ले जाएंगे।
अपने अमेरिका प्रवास में हम लगभग रोज बाज़ार जाते। तब वहां के बड़े-बड़े मॉल्स देख कर हमारी आंखें फटी रह जाती थीं। हमें जो चीज अच्छी लगती, हम खरीद लेते। चाहे उन चीजों की ज़रूरत हो न हो, पर हम यही सोचते कि इन्हें साथ ले जाएंगे। हमने तो ढेरों उपहार भी खरीद लिए थे। मुझे लगता कि अपनी सास को ये देंगे, साली को ये, उसके बच्चे को ये। बहनों के लिए ये वाला गाउन, वो वाला इलेक्ट्रानिक उपकरण, तो बहनोई के लिए घड़ी, जूते, सूट और न जाने क्या-क्या। अपने तो दोस्त भी कम नहीं थे, सो उनके लिए फोन, म्यूजिक सिस्टम और बहुत कुछ।
इस तरह कब हमने सौ किलो सामान जमा कर लिया हमें पता भी नहीं चला। हम सामान खरीदते और उन्हें सूटकेस में रख लेते।
लेकिन हमें पता तब चला जब हम वहां से चलने को तैयार हुए।
मुझे मालूम था कि कितना वज़न ले जाने की अनुमति है। और जब हमने अपने सूटकेस खोले तो हैरान रह गए। पता नहीं कितनी तरह के म्यूजिक सिस्टम मैं पिछले साल खरीद चुका था। कई डिजिटल कैमरे खरीद चुका था। फोटो एलबम, घड़ियां, और तो और ढेरों जूते।
जींस और शर्ट की तो बात ही छोड़िए। जिन कपड़ों को मैं पहन चुका था, उनका मोह त्यागना आसान था। पर अभी हमने जिन कपड़ों को हाथ भी नहीं लगाया था और जिन कपड़ों को हमने बहुत पसंद से सेल में ढूंढ-ढूंढ कर खरीदा था, उन्हें यूं छोड़ कर जाने का दिल नहीं कर रहा था। आप यकीन कीजिए जिस दिन हम भारत से अमेरिका जा रहे थे, हमने जाने वाली सुबह सारी पैकिंग की थी। पर अमेरिका से चलते हुए हमें दस दिन लगे पैकिंग करने में। हमारी समझ में ही नहीं आ रहा था कि इन सारी चीजों का अब करें क्या।
पलंग, गद्दे, सोफा, डाइनिंग टेबल और कुर्सियां तो हम फेंक ही चुके थे।
अमेरिका में अगर आप किराए के मकान में रहते हैं, तो जब भी आप मकान छोड़ कर जाते हैं, तो आपको उसे पूरी तरह खाली करके, साफ करके मकान मालिक को लौटाना होता है। ऐसे में हम ये भी नहीं कर सकते थे कि सारा सामान वहीं छोड़ कर निकल जाएं। अगर हम ऐसा करते तो हमने जो सिक्योरिटी का पैसा जमा कराया था, वो उसमें से पैसे काट लेता।
अब हमारे पास सचमुच सामान फेंकने के सिवा कोई चारा नहीं था।
काफी भारी मन से हमने सामान फेंकना शुरू किया। हर यात्री को दो बैग लाने की छूट थी। इस तरह हमने छह सूटकेस में जितना सामान आ सकता था, भर लिया।
और अब आखिरी कड़ी में उन्ही सूटकेस में से मेरे जींस, टेपरिकॉर्डर निकाले जा रहे थे।
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हमने अपने पांच साल के अमेरिका प्रवास में बहुत मेहनत की। जितना पैसा कमाया, उससे ढेर सारी चीजें खरींदी। कई बार बिना सोचे समझे खरीदीं। पर अब उन सबको अपने साथ लाना संभव नहीं हो रहा था। ऐसे में एक-एक कर ढेर सारी चीजें हमने घर के नीचे पड़े बड़े से कूड़ेदान में फेंक दी। हमने देखा था कि वहां लोग अपने पुराने सोफा, पलंग, गद्दा आदि कूड़ेदान में रात में फेंक आते थे। शुरू में हम उन लोगों पर हंसते थे, पर जल्दी ही हमें समझ में आ गया था कि यहां सामान ढोना ज्यादा महंगा सौदा है।
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खैर, हमने भी भारी मन से बहुत सी चीजें फेंक दीं। हर एक चीज फेंकते हुए यही लग रहा था कि काश इस पैसे से हम फलां जगह घूम ही आए होते। ओह! कलेजे पर पत्थर रख कर हमने ये वाला रिकॉर्ड प्लेयर लिया था, काश इसे लेने की जगह एक दिन कहीं उस रेस्तरां में कुछ खा ही आते, जिसे बाहर से देख-देख कर यही सोचता रहा कि खाने पर पैसे क्यों खर्चें।
और अब, दिल से खरीदी उन्हीं चीजों को यहीं छोड़ कर, फेंक कर जाना पड़ रहा था। ऐसा लग रहा था कि कोई हमसे हमारी मेहनत छीन कर ले जा रहा हो। पर कोई विकल्प नहीं था।
हां, कोई विकल्प नहीं होता जब आदमी चीजों के लालच में फंस जाता है।
***
हम बहुत मेहनत से सारी चीजें जुटाते हैं। हम उनका इस्तेमाल नहीं करते। हम सोचते हैं कि एकदिन इन्हें साथ लेकर जाएंगे।
काश ऐसा कर पाते!
सच यही है कि हम ढेर सारी चीजें जुटा लेते हैं, लेकिन हम कुछ साथ नहीं ले जा पाते। जो अपनी मेहनत की कमाई का सुख भोग लेते हैं, उन्हें तो अफसोस नहीं होता, लेकिन जो मेरे अमेरिका प्रवास की तरह सारी चीजें सिर्फ जुटाने में लगे रहते हैं, वो न इस यात्रा का आनंद उठा पाते हैं, न उस यात्रा का।
आप भी तय कर लीजिए कि जितना है, उसका सुख भोग लेना है, नहीं तो एक दिन सब यहीं कूड़ेदान में फेंक कर जाना पड़ेगा।

‪#‎Rishtey‬ Sanjay Sinha

Comments
  1. Arun | Reply

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