हर खुशी की कीमत होती है

रूचि की यादें :

फरीदाबाद शहर में मैं जिस जगह रहती हूँ वहाँ मिलता तो सब कुछ है आस-पास की दुकानों में पर बाज़ार जैसा नहीं है।बाज़ार जाने के लिए बीच रास्ते में एक लंबी नहर आती है। हालाँकि नहर को पार करना बहुत मुश्किल नहीं है पर नहर की लंबाई देख कर बाज़ार जाने की चाह इस पार ही खड़ी रह जाती है लेकिन मेरी ये चाह आखिर इस हफ्ते मुझे नहर पार ले ही गई मेरा हाथ थामे बाज़ार में ….

शाम का वक्त था सात-सवा सात … दिन इतवार…और जगह थी फरीदाबाद की सेक्टर एक मार्केट ।हज़ारों की संख्या में रंग-बिरंगी छोटी-बड़ी दुकानें ।कपड़े-बर्तन साज सजावट का लगभग सब सामान दुकानों में और ठेलों पर सजा-धजा। नवरात्रि के आगमन से दुकानें लाल सुनहरी गोटे से सजी हुई थीं, लोगों से बाज़ार ठसाठस भरा हुआ था। सड़क पर फेरीवाले ..चकरी -गुब्बारे वाले यहाँ से वहाँ घूम रहे थे। इन्हीं के बीच मुझे दिखा … काँच के कंगन और चौड़ी चूड़ियों से सजा हुआ एक ठेला ।हर रंग के कंगन थे… लाल काला नीला पीला फिरोज़ी हरा गुलाबी ….ढेर सारे रंग और मेरी आँखें वहीं अटक गईं … चालीस के दो कंगन …. अब तय करना मुश्किल कि कौन से रंग के लिए जाएं … कभी निगाह लाल पर दौड़ती कभी पीले पर जाती और नीले पर ठहर जाती…. हर रंग अपनी ओर खींचता था … ऊहापोह की इस स्थिति में मैंने चूड़ी वाले से पूछा , “भाई ,ये चूड़ी का ठेला कितने का है?” … उसने हैरत से मुझे देखा और हँस दिया … और मैं चूड़ी देखते हुए आगे बढ़ गई …

थोड़ा और आगे बढ़ने पर मुझे एक फेरीवाला दिखा कागज की रंग-बिरंगी चकरी बेचता हुआ । दस -दस रूपए में चकरी हवा में गोल घूम रही थी ।उसने ढेर चकरी एक ऊँचे डंडे पर बाँधे हुई थीं।वो बेचते हुए चल रहा था ,चकरी भी उसके साथ-साथ घूमते हुए चल रही थी ।

थोड़ा आगे जाने पर एक ठेले पर काँच के गिलास और कप- प्लेट बिक रहे थे। चकरी वाला उस ठेले के बगल में जाकर खड़ा हो गया । वहीं उस ठेले के पास एक महिला अपनी छोटी सी बच्ची को गोद में उठाए , ठेले वाले से कप -प्लेट का दाम पूछ रही थी और उसकी छोटी बच्ची आँखें ऊपर उठाए घूमती हुई रंग-रंग-बिरंगी चकरी देख रही थी। वो बच्ची बहुत छोटी थी … बोल नहीं सकती थी … पर गोल घूमती चकरी में उसकी आँखें अटक गई थीं। चकरी को हवा में घूमते देख कर उसने अपना हाथ चकरी की ओर बढ़ा दिया …. उसे चकरी चाहिए थी ।

मैं रुक कर देखने लगी और देखते-देखते घर लौट आयी। उस रोज़ न मैंने चूड़ी खरीदी न उसने चकरी और हम दोनों ही लौट आए अपने -अपने घर अपने सपनों को बाज़ार में छोड़ कर। हम दोनों फिर बाज़ार जाएंगे।बाज़ार हमें बुलाएगा । उसे आती है कला अपने पास खींचने की और हम जाएंगे ।सपने खरीद कर लाएंगे।बाज़ार में सब बिकता है ।हम पैसे लेकर जाएंगे ।खुशियाँ खरीद कर लाएंगे । हर खुशी की कीमत होती है …………..

लेखिका – Ruchi Bhalla [ एक पन्ना डायरी का ………]

Ruchi Bhalla Writer

 

Comments
  1. Parul Agrawal @-Hindimind.In | Reply

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