प्यार सभी को

जब हम छोटे थे, जब अमेठी के गांव में थे, गांव के युवा लोग होली के दिन, दोपहर बाद, एक गांव से दूसरे गांव जाते थे, होली मिलने । बड़ो के चरण स्पर्श करते थे । आशीर्वाद लेते थे । दुवारे खटिया पर बैठते थे । चना चबैना लाई गुड़ गोझा खाते थे । दूसरे ग्राम भाई से मिलते थे । रिश्ते नाते करीबी घर के अंदर आंगन में जाते थे । दादी चाची को चरण स्पर्श करते थे । भौजाई को चरण स्पर्श करते थे, प्रणाम करते थे । कुछ भौजाई मजाक मजाक में गले भी मिलती थी, भाइयों की तरह । सभी हंसी मजाक करते थे । थोड़ी देर बाद प्रणाम करके, दूसरे गावं की तरफ चल देते थे ।
 
जब थोड़ा बड़े हुए । लखनऊ में रहने लगे । यहां भी होली मिलन होता था । गावं का छोटा संस्करण था, थोड़े अलग रूप में ।
 
जब बड़े हुए । काम कहां न ले जाए । मुंबई आ गए । दूरी बढ़ गई । गांव से, मेल मिलाप से, प्रेम व्यवहार से, भाई भौजाई से, गुड़ चना लाई से, चाची दादी माई से ।
 
प्यार सभी को, उस गांव को भी, इस शहर को भी, उस शाम को भी, इस पहर को भी ।।

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