कुंभ की यादें

चार मई २०१६ की रात मैं, पत्नी व बेटी मुंबई से भोपाल के लिए अमृतसर एक्सप्रेस में सवार हो गए. उधर मामा मामी जी ने अमेठी से ट्रेन पकड़ी. माँ, पिताजी व मौसी जी ने वही ट्रेन लखनऊ से पकड़ी. सभी पांच ता. को भोपाल में मिले. अगली ट्रेन शाम के ६ बजे आई और भोपाल से उज्जैन की यात्रा शुरू हुई. सभी का स्लीपर क्लास में रिजर्वेशन था. AC में टिकेट मिला नहीं और प्रयत्न भी नहीं किया. यूँ कही कि जानबूझ कर स्लीपर में ही टिकेट कराया था. ऐसा क्यों किया यह बाद में बताऊँगा.
 
जब उज्जैन स्टेशन पंहुचे तो रात के साढ़े दस बज रहे थे. प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के हर डिब्बे के सामने कम से कम १ पुलिस खड़ी थी. भारी बंदोबस्त था. पुलिस के अलावां जगह जगह कुंभ मेला सहायक थे. गाइड थे. ऐसा लग रहा था कि सभी को स्पेशल ट्रेनिंग दी गई है. गाली और डंडे से बात करने वाली बदनाम पुलिस यहाँ काफी विनम्र दिख रही थी. पब्लिक को समझा बुझा कर बात कर रही थी. यह बात अच्छी लगी. तारीफेकाबिल लगी.
 
हमें झंडा बाबा के आश्रम जाना था. ये आश्रम टेंट के बने होते हैं. कैंप जैसे होते हैं. वही कैंप जिनमे ठहरने के लिए टूरिज्म वाली जगह आप एक दिन का हजारो किराया देते हैं. ये कैंप फ्री होते हैं. भोजन भी यहाँ फ्री होता है. आप के अपने लोग यहाँ मिलते हैं. सब बैठ कर साथ में बात करते हैं, प्रार्थना पूजा करते हैं, सत्संग करते हैं, घाट जाते हैं, स्नान करते हैं, प्रसाद या भोजन करते हैं. यह सब सामूहिक होता है. समूह में किये गए कार्य का विशेष आनंद होता है. वह आनंद आपको ५ स्टार होटल के AC रूम में नहीं मिल सकता.
 
खैर, मैं बता रहा था कि हमें झंडा बाबा के आश्रम जाना था. पर वहां से फोन आया कि तूफान आया है और बहुत बारिश हुई है. कुछ टेंट उखड़ गए है. हम सब स्टेशन पर रुक जाएं और सुबह आश्रम में आएं. स्टेशन देखा तो प्लेटफॉर्म कुछ खाली था पर पुलिस वहां सोने या बैठने नहीं दे रही थी, समझा बुझा कर कह रही थी कि हम बाहर बने यात्री पंडाल में जाएं, अन्यथा प्लेटफॉर्म पर बहुत भीड़ हो जाएगी, व्यवस्था बिगड़ जाएगी, हादसे हो जाएँगे. हम मान गए. यात्री पंडाल गए. वो खचाखच भरा था. जिधर देखो उधर कोई अपनी एक चद्दर बिछा कर सो गया था. बहुत प्रयत्न के बाद हम आठों लोग 8’ x 5’ जगह में अपनी चद्दर बिछा लिए. यह पंडाल के बाहर आने जाने की जगह का एक कोना था जो ब्लाक था और लोग उधर से नहीं आ जा रहे थे.
 
3 बजे ही सुबह हो गई. लोग उठ कर घाट की तरफ स्नान के लिए प्रस्थान करने लगे थे. 4 बजे हम भी उठ गए. सामान इकठ्ठा किया और चल दिए.
 
लाखों लोग एक ही दिशा में चलते जा रहे थे. राम घाट की तरफ. प्रातः स्नान के लिए. किसी के सर पर गठरी थी, किसी के हाथ में थैला. जिधर एक मुड़ता था उधर ही उस समूह के सभी मुड़ जाते थे. देश के हर गावं के लोग दिख रहे थे. मिनी इंडिया था यह. मैंने बेटी से कहा कि देख लो अच्छी तरह इसे, यही असली भारत है.
 
हमें तो आश्रम जाना था. बड़ी मुश्किल से हमें एक वैन मिल गई. उसमे सवार होकर हम सभी चल दिए. रास्ते भर भारी बारिश और उससे हुआ नुकसान दिख रहा था. पर यह तूफान हारता हुआ दिख रहा था. लोगों में वही जोश था. गिरे टेंट खड़े किए जा रहे था. २० मिनट बाद आश्रम पंहुच गए. गुरु जी का चरण स्पर्श हुआ. अपने कई सगे पराए मिले. नमस्कार प्रणाम हुआ. कई गले मिले कई ह्रदय मिले.
 
पास के घाट गए. बहुत सुन्दर घाट बनाए गए हैं. जगह जगह सहायक हैं. लाइफ सेविंग बोट है. लाइफ गार्ड हैं. गाइड हैं. कपड़ा धोने की मनाही है. साबुन की मनाही है. साफ़ सफाई है. एक जगह से दूसरी।जगह जाने के लिए फ्री बस सेवा है । जगह जगह पानी की व्यवस्था है । सारी व्यवस्थाएं बहुत अच्छी है. स्नान के बाद कैंप लौट आए. लौटने के बाद कैंप में नाश्ता हुआ, भोजन हुआ, प्रार्थना हुई. धार्मिक काम हुआ. बहुत आनंद आया.
 
7 को महाकाल जी के दर्शन किए. रामघाट गए. वहां से आश्रम तक पैदल आए. रास्ते में नागा बाबा लोगों की शोभा यात्रा निकल रही थी. नागा बाबा दुनिया के लिए हमेशा जिज्ञासा का विषय बने रहे हैं और बने रहेंगे. बहुत सारे दूसरे पंडाल देखे.
 
8 को सुबह सुबह घाट जाकर स्नान किया. दोपहर 12 बजे माँ पिताजी मामा मामी मौसी को ट्रेन में बिठा कर विदा किया. शाम को 4 बजे अपनी ट्रेन थी. जगह जगह ट्रैफिक जाम लग रहा था. दोपहर में हमने भी गुरु जी से विदा ली. इन 2-3 दिनों में सभी अपने हो चुके थे. सगे भी और पराए भी. सभी अपनों से विदा ली.
 
गुरु जी का आशीर्वाद मिला. अनंत ख़ुशी मिली. आश्रम ने वह खुशी दी जो हमें लाखों खर्च करने में भी नहीं मिलती. बहुत अच्छी व्यवस्था थी. हर व्यवस्था में धन लगता है. यह खुशी अपने दूसरे भाइयों को भी मिलती रहे. इसलिए AC छोड़ कर स्लीपर में टिकेट लेने से जो पैसा बचा था, उसमे कुछ और जोड़ कर, आश्रम को गुप्त दान कर दिया.
 
जय महाकाल.
जय गुरुदेव.
जय कुंभ.

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