हर साड़ी की एक कहानी होती है

हर साड़ी की एक कहानी होती है ।

पत्नी जी आज साड़ियां देख रही हैं । पत्नियां 500-1000 साड़ियों में रख देती हैं, और भूल जाती हैं । भूल जाना उनकी जमा योजना का unplanned पहलू है । खैर, अब समय आ गया है कि साड़ियों को एक बार देख लिया जाए, search operation कर लिया जाए, 500-1000 जमा करने की अंतिम तारीख नजदीक आ रही है ।

पत्नी जी ने साड़ियां देखने लगी तो उनकी यादें भी चलने लगी ।

…. ये साड़ी राधेश्याम भैया ने दी थी ….
…. ये साड़ी पापा ने तब दी थी जब …..
…. ये साड़ी बाबू जी ने दी थी ….
…. ये साड़ी, पैठन वाली, आप लाए थे ….
…. ये साड़ी माँ ने दी थी ….

…. ये वाली साड़ी, कितनी हलकी है, रेशम की है, याद है आपको, आपके साथ जब पहली बार मैं मंदिर गई थी, शादी के फेरे के बाद, तब पहनी थी, और आपने मेरा हाथ पकड़ा था, पहली बार ….

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