प्यार तुम्हे अवनीश

बात 2012 की है. एक लड़का था, अवनीश सिंह. कंप्यूटर इंजीनियरिंग का स्टूडेंट था. शारदा यूनिवर्सिटी में. फेसबुक पर कुछ कुछ लिखता था. लिखता अच्छा था. एक दिन मैंने देखा कि वो उलझन में है. इंजीनियरिंग के आखिरी वर्ष में अधिकतर स्टूडेंट उलझन में रहते हैं. उन्हें अपने भविष्य की चिंता होती है. अधिकतर माँ बाप बच्चों को बैंक से लोन लेकर इंजीनियरिंग में डालते हैं. स्टूडेंट को टेंशन होता है कि अगर उसका अच्छा रिजल्ट नहीं आया तो गड़बड़ हो जाएगी. रिजल्ट ठीक ठाक आए पर नौकरी न लगे तो गड़बड़ हो जाएगी. गड़बड़ हो गई तो लोन कैसे भरेगा. वो नहीं भरेगा तो उसके माँ बाप को भरना पड़ेगा. माँ बाप पर बोझ बढ़ जाएगा. यह लगभग हर मिडिल क्लास परिवार की कहानी है. मुझे मालूम है, मैं देखता हूँ, मैं महसूस करता हूँ.

उसकी उलझन भरी पोस्ट पढ़कर मैंने उसकी काउंसेलिंग की, उसको सलाह दी. बात यहीं खतम हो जानी थी. पर न जाने क्या रिश्ता था उस अनजान से कि बात खतम नहीं हुई, उलटा बढ़ गई.

12 मई 2012 को मैं उसे Barista, Botanical Garden, Noida में मिला, और उससे कहा कि अगर वह ठीक समझे तो मेरे मुंबई ऑफिस में आकर काम कर सकता है. यह सही है कि काम पुर्णतः उसके सपनों के अनुरूप नहीं है पर उसे एक शुरवाती प्लेटफ़ॉर्म जरुर मिल जाएगा, बाकी वह स्वतंत्र होगा अपनी उड़ान उड़ने के लिए.

29 June 2012 को वो झिझकते सकुचाते मुंबई आया और मेरे ऑफिस में काम करने लगा. एक साल बाद मैंने उसे सलाह दी कि उसे core प्रोग्रामिंग में इंटरेस्ट है, जो हम नहीं करते, इसलिए अगर वह चाहे तो मैं उसे किसी सहयोगी से बात करके उसके यहाँ काम दिलवा दूँ. वो मान गया. मैंने अपने सॉफ्टवेर इंजीनियर की कंपनी में उसे जॉब दिलवा दी. जुलाई 2013- जुलाई 2014 वह वहां काम करता रहा. मैं खुश था कि वो वहां कुछ सीख रहा है और खुश है.

एक दिन उसका फोन आया कि सर, मेरा मन नहीं लग रहा, आप मुझे वापस अपने पास बुला लो. मुझे मालूम था कि मेरे पास वो काम नहीं है जो उसे भविष्य देगा, पर मैं ना नहीं कर पाया. अगस्त 2014 – अक्टूबर 2015 वो पुनः मेरे साथ था.

3 नवंबर 2015 में वह दिल्ली चला गया. उसके सभी दोस्त दिल्ली में थे. उसका सोचना था कि दोस्तों के साथ मिलकर वहां कुछ नया काम करेगा. मुझे पता था कि मुंबई के प्रोफेशनल कल्चर में रहने के बाद उसे दिल्ली रास नहीं आएगी. पर हम सभी को समझाते हैं कि अपने इंटरेस्ट का काम करो, सपने देखो और उड़ान भरो. फिर कैसे मैं उसे रोक पाता.

2016 खतम होने को आ गया है. मुंबई से गए उसे एक बरस हो गए हैं. बातें होती रहती है. ना उसका मन लगता है, ना मेरा. मुझे मालूम है, ऐसा होता है, जब किसी से स्नेह हो जाए, प्यार हो जाए, तो ऐसा होता है.

कोई नहीं जानता समय को, क्या मालूम 2017 में कुछ गजब हो, और कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करूँ, और फोन कर के बोलूं कि अवनीश, आ जाओ साथ में काम करेंगे.

प्यार तुम्हे अवनीश.

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Comments
  1. kadamtaal | Reply

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