प्रेम !

प्रेम !
तुम्हे
विस्तृत आकाश
और धरा के मध्य
वरण किया है
मेरे हृदय ने

प्रेम !
उषा काल में
पवित्र
सूर्य किरणों के
नर्म स्पर्श में
अनुभूत किया है
मेरी देह ने

प्रेम !
खिलते प्रसून
बारिश की बूंदों
और….
इन्द्रधनुष के रंगों में
तुम्हें देखा है
मेरी आँखों ने

प्रेम !
पत्तियों की सरसराहट
नदी की कल-कल
और मन्द हवा के
मधुर स्वरों में
सुना है मैंने
प्रेम राग.

प्रेम!
अब मैं तुम्हे
गाना चाहती हूं
ओमकार स्वर में

लिखना चाहती हूं
प्रत्येक हृदय पर.

प्रेम !
मैं तुम्हे
बाँटना चाहती हूं
संपूर्ण सृष्टि के
कण-कण में.
श्वासों के अंतिम
स्पन्दन तक.

वसुंधरा व्यास

Comments
  1. Arun Mishra | Reply

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