फलों से स्वागत करें

गोवा के राज्यपाल मृदुला सिन्हा जी ने एक लेख लिखा है जो पुरे  देश के हित में हैं अगर यह परंपरा पुरे देश में कायम हुआ तो देश तरकी की और अग्रसर होगी मृदुला जी को यह विचार गुजरात से आया है, लेकिन सबके लिए उपयोगी है।

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने एक कार्यक्रम चलाया है, जिसके तहत राज्य भर में अब गणमान्य लोगों का स्वागत फूलों से नहीं, फलों से किया जाएगा। इस कार्यक्रम के तहत जितने भी फल एकत्रित होंगे,वे किसी आंगनबाड़ी केंद्र, विद्यालय या अनाथलय में भेजे जाएंगे। पूरी दुनिया की तरह ही भारत में भी लोगों का फूलों से स्वागत करने की परंपरा बहुत पुरानी है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी महत्वपूर्ण व्यक्ति का पुष्पगुच्छ से स्वागत करता है, तो अक्सर वे पुष्पगुच्छ व्यक्ति के मान-समान और व्यक्ति की आर्थिक क्षमता का प्रदर्शन करते हैं, उस व्यक्ति का नही,जो सम्मानित होता है। देस भर में एक दिन में भिन्न-भिन्न स्तर के नेताओं के स्वागत में हजारों टन पुष्प खर्च किए जाते हैं। स्वागत के बाद उनका कोई सदुपोग नहीं होता है, फूलों की उपयोगिता समाज  में जहां है, वहां उनका उपयोग होना चाहिए। लेकिन गणमान्य लोगों के सम्मान में यदि फूल की जगह फल के छोटे-छोटे टोकरे का उपयोग हो, तो उसका शहर और गांव के गरीब बच्चों के लिए उपोयग हो सकता है। हमारे देश में आज कुपोषण की बहुत चर्चा होती है। इसका स्थानीय स्तर पर एक समाधान ऐसे भी हो सकता है। यह ठीक है कि इससे सभी कुपोषित बच्चों को सुपोषित नहीं बनाया जा सकता है। परन्तु स्वागत के फुल की जगह फल का उपयोग संवेदनशीलता का प्रतीक तो है ही। गोवा में राज्यपाल पद की शपथ लेने के बाद मैंने तय किया कि मैं भी यही करूंगी । पिछले दिनों मुझे उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी और उनकी पत्नी सलमा अंसारी का एयरपोर्ट पर स्वागत करने का अफसर मिला, तो में इसके लिए फल  लेकर ही वहां पहुंची, जिसे देखकर उपराष्ट्रपति की आंखों में आश्चर्य के भाव उभरे -फल? मैंने जब फुल के बदले फल के बात बताई तो वह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा – मैं पिछले सात वर्षों से लोगों से कह रहा हूं कि स्वागत के लिए फुल बर्बाद मत करो, एक फूल काफी है। पर मेरे दिमाग में फुल के बदले फल की बात नहीं आई। ये फल में दिल्ली ले जाऊंगा। एक दो खाऊंगा और  बाकी जरूरतमंदों को भिजवाऊंगा।। अब यह उम्मीद सभी गणमान्य लोगों से है। हमारे देश में बहुत सारी ऐसी गंभीर समस्यएं हैं, जिन्हें छोटे-छोटे  निर्णयों व कर्यां से सुलझाया जा सकता है। जब इस निर्णय की चर्चा मैंने गोवा के किसी गण्यमान्य व्यक्ति से की तो उन्होंने मुझे बताया कि फुलों के गुच्छे की तुलना में फल देना सस्ता रहेगा। फिर यह भी पता चला की गोवा में फूलों की खेती बहुत ज्यादा होती भी नहीं । वहां फूल बाहर से मंगवाए जाते  हैं। जहां फूलों की खेती होती है। वहां भी फल की छोटी डाली एक बड़े गुच्छे से सस्ती ही पड़ेगी वैसे यह महेंगे और सस्ते की बात नही है। बात तो भावना की है और सरोकार की है, जिसे पूरे देश को अपनाना ही चाहिए।

माननीय मृदुला सिन्हा जी, राज्यपाल, गोवा, २०१६


साभार – http://www.prernabharti.com/

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