मुलाकात

बात 1993 की है । मैं सेंट ज़ेवियर टेक्निकल इंस्टिट्यूट माहिम में प्रोफेसर था । शादी के बाद सुल्तानपुर से मुंबई आए पत्नी रेणु को दो चार माह हुए थे । रेणु ने बताया कि उनकी बहन मुंबई में मलाड में रहती हैं । जीजा जी का नाम गजेंद्र तिवारी जी हैं । उनके नाना का दूध का काम था । शायद दारूवाला चॉल नाम है इलाके का ।

मैं दारूवाला कंपाउंड जानता था । उसके पास के NL हाई स्कूल में 1989 में Aptech का ट्रेनिंग सेंटर था । उसमें उस समय मैं फैकल्टी था ।

एक दिन हम दोनों दीदी जीजा को ढूंढने निकल पड़े । कंपाउंड के आस पास ढूढंते रहे । इधर उधर की सड़कों पर भी भटके । एसवी रोड के साथ साथ, सामने की मार्वे रोड पर भी देखा । सब से पूछ रहे थे की गजेंद्र जी कहाँ रहते हैं, गजेंद्र तिवारी जी, जिनके नाना जी का दूध का काम था । पर बात बन नहीं रही थी ।

फिर सोचा चलो चाय पी ली जाए । उसी कंपाउंड में सड़क पर मिठाई की दुकान थी । वहीँ गए चाय पीने । उनसे भी वही सवाल – गजेंद्र तिवारी जी कहाँ रहते हैं ? वो बोले – अरे गज्जू भाई, उधर जाइए, सिग्नल के सामने की सैलून वाली गली में मुड़ जाइए, और उनके घर पहुँच जाएंगे । घर के सामने गाय होगी ।

गाय भी मिली । घर भी मिला, दीदी मिली, जीजा मिले, छोटे छोटे बच्चे मिले, गुड्डी Sheetal मिली, Kunal मिला, प्यारी सी बेबी Shraddha मिली, प्यारा सा सिद्धार्थ मिला, बहुत प्यारी एक नई दुनिया मिली, ईश्वर मिले ।

जी हां, ईश्वर मिले । उस घर में ईश्वर का वास था । हमने अनुभव किया । हमने ईश्वर को देखा भी । दीदी व जीजा जी ईश्वर का ही रूप थे । दोनों बहुत सज्जन मिलनसार सरस धार्मिक व्यक्ति थे । उनके व्यक्तित्व में मधुर आकर्षण था । मेरे बच्चों को दोनों लोग बहुत अच्छे लगते थे ।

रेणु की दीदी व जीजा जी अब नहीं हैं । कई साल पहले, बहुत कम उमर में, संसार छोड़ कर वे दोनों परमात्मा के पास चले गए ।

सच कह रहा हूँ, हमें आप अक्सर याद आते हैं । ऐसा लगता है कि आप आस पास ही हैं कहीं ।

प्यार आप दोनों को ।

अरुण व रेणु 😊😊

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