बेचारा आदमी

बेचारा आदमी

गौरीगंज, अमेठी के गांव से मुंबई में आकर आदमी काम करने लगा । शादी हो गई । बच्चे हो गए । स्थिरता के लिए उसने फ्लैट ले लिया । एक दूकान ले ली । ऑफिस खोल दिया । लोगों ने कहा समृद्धि आई है । तालियां बजी । बजती तालियों से खुशी हुई । खुशी खुशी में माया मोह का जाल फैलता गया । बच्चे बड़े हो गए । उनका कॉलेज, उनका जॉब, उनका कैरियर । अब बच्चे मुंबई छोड़ना नहीं चाहते । उनके अपने सपने हैं, उनकी अपनी मजबूरियां हैं । सपने भी हैं और मजबूरियां भी । काम नहीं करेंगे तो कैसे जीवन चलेगा । बस यही यथार्थ सब प्रश्नों को चुप करा देता है । बेचारा आदमी चुप हो जाता है ।

उधर माँ बाप गांव नहीं छोड़ना चाहते । मुंबई का फ्लैट उन्हें पिंजरा लगता है । पिंजरा तो आदमी को भी लगता है । पर आदमी को पिंजरे में रहने की आदत पड़ गई है । वो आए कुछ दिन जैसे तैसे पिंजरे में रहे, चले गए । बेचारा आदमी चाह कर भी उन्हें नहीं रोक पाया । स्वयं नहीं तो कम से कम माँ बाप ही पिंजरे से आजाद रहें, खेत खलिहान गांव देश की खुली हवा में रहें । यही सोच कर आदमी मनमसोस कर शांत हो गया ।

बेचारा आदमी, अपने ही फैलाए जाल में फंस गया ।

एक दिन गांव में रह रहे पिताजी दुनिया छोड़ कर चले गए । आदमी समय से नहीं पहुंच पाया । आदमी था, जिम्मेदारी थी, सब को संभालना था, रो भी नहीं पाया बेचारा !

आदमी को मालूम है कि माँ बूढ़ी है । गांव नहीं छोड़ेगी । पिताजी चले गए पर उसके लिए अभी भी वो वहीं हैं । छोटा बेटा साथ में है, पर वो भी अपनी पारिवारिक समस्यायों में उलझा है । आदमी मुंबई में, अपने फैलाए जाल में, अभी भी फंसा है । वह जानता है कि उसे क्या करना चाहिए । वह जानता है कि समय को किसी ने नहीं देखा । वह जानता है कि वह काम और परिवार में फंसा है और पुत्र धर्म नहीं निभा पा रहा है । बेचारा आदमी सब जानते हुए, चाह कर भी, कुछ नहीं कर पा रहा 😢

घर घर की कहानी है । पैसे और परिवार ने बहुत लाचार बना दिया है आदमी को 😢😢

अरुण

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