हम उसी लड़की से अपने नाती का विवाह करेंगे

बहुतै सुंदर कहानी

कहानी प्रतापगढ़ के शुक्ला जी, उनकी धर्मपत्नी व उनकी नतोहू की है । कहानी एक बरस पहले की है, कहानी सत्य है और अच्छे समाज के लिए अनुकरणीय उदाहरण है ।

शुक्ला जी अपनी पत्नी के साथ प्रयागराज में गंगा किनारे माघ मास में कल्पवास पर थे । उनके बेटे के बेटे,मतलब नाती से अपनी बहन के विवाह की बात करने के लिए एक युवा उनसे मिलने गया। युवा की उम्र 22 के पास समझ लीजिए । नाम नही लिखूंगा, पर अभी के लिए राजेश समझ लीजिए । राजेश ने 70 वर्षीय शुक्ला जी को प्रणाम किया व बात शुरू की ।

‘बाबा जी, मैं फलां गांव से हूँ । अमुक का बेटा हूँ । अमुक ब्राह्मण जाति से हूँ । आप के नाती से अपनी बहन के विवाह का इच्छुक हूँ ।’

बाबा जी दादी जी से सलाह किए व बोले – अभी हम लोग कल्पवास में हैं, इस बारे में जादा बात नहीं कर पाएंगे । आप बाद में घर पर आइए । वहीं बात हो पाएगी ।

एक माह बीत गया । कल्पवास का समापन हो गया । शुक्ला जी अपने गांव वापस चले गए । एक दिन वहां पुनः राजेश आया । प्रणाम किया । बात पुनः आगे बढ़ाई ।

‘बाबा जी, मैंने भैया (वर) के बारे में जानकारी मालूम की है । मुझे भैया अच्छे लगे हैं । मेरे पिताजी का देहांत हो चुका है । बहन का विवाह मेरी जिम्मेदारी है । मैं आपके चरणों में हूँ । आप व दादी जी आशीर्वाद दीजिए ।’

बाबा जी ने दादी से पुनः विचार किया । दादी ने कहा कि इस बारे में वो परिवार से बात करेंगी ।

राजेश ने अपनी बात स्पष्ट किया । ‘बाबा जी, मेरे पास कुछ नहीं है, कुछ दे नहीं पाऊंगा, जितना हो पाएगा उतना जरूर करूंगा’ ।

हमारे समाज में, हो या न हो, पर दहेज एक अनिवार्यता है, आर्थिक असर्मथता से अधिकतर रिश्ते, YES से NO बदल जाते हैं । इस बात की अंदेशा को राजेश रोक न पाया व बोल दिया –

‘बाबा जी, मेरे पिताजी नही रहे, अब आप ही हमारे सहारे हैं, हमारे पिता हैं, हमारे बाबा हैं’ ।’

दादी बोली – बेटा तुम घर जाओ, हम सब से बात करके, सोच विचार करके बताएंगे, सब की सहमति होगी तो तुम्हारी बहन से मिलेंगे । अभी घर जाओ ।

एक दिन शुक्ला जी को समाचार मिला कि जो लड़का अपनी बहन के रिश्ते के लिए पहली बार कल्पवास में मिला था, बाद में दो तीन बार घर आया था, उसकी एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई । शुक्ला जी व उनका पूरा परिवार उस लड़के की अंत्येष्टि में गए ।

किसी ने बताया कि लड़की वहाँ बैठी है । दादी ने उसकी तरफ देखा । पिता के परलोक जाने शोक के बाद भाई का शोक वह झेल नही पाई । उसका पूरा शरीर मुरझा गया था । रंग काला पड़ गया था । वो लड़की बदहवास भागते हुए आई । दादी के पैर पकड़ ली । रोने लगी । रोते रोते बोली – ‘दादी, अब मैं क्या करूँ, पिताजी पहले ही चले गए थे, अब भैया भी चले गए । भैया कह रहे थे कि अब आप ही मेरे सब कुछ होगे, मुझे आपकी सेवा करनी है । मेरे को समझ में नही आ रहा कि अब मैं क्या करूँ, अब मैं कहाँ जाऊं’ !

दादी बोली – ‘बेटी, रोओ नहीं, तुम मेरी नतोहू होगी और कदाचित नही हो पाया तो नातिन होगी ।’

दादी घर आईं । परिवार में लड़के (वर) को, उसकी मां को, उसके पिता को व अन्य सभी को समझाया कि रिश्ता कल्पवास में आया है, मां गंगा के तट पर आया है, रिश्ता लाने वाला अब नही है, इसलिए हमारी सामाजिक व धार्मिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है, हमें ईश्वर के भेजे हुए रिश्ते को स्वीकारना चाहिए । बाबा जी ने सभी से कहा कि दादी का मन समझा जाए, उनकी भावना को समझा जाए । सभी ने बात सुनी व अंतिम फैसला दादी जी पर छोड़ दिया ।

और दादी जी ने फैसला सुनाया कि –

‘हम उसी लड़की से अपने नाती का विवाह करेंगे । वो हमारी नतोहू बनेगी । दहेज वगैरा की कोई भी व्यक्ति बात नही करेगा । विवाह का सारा खर्चा, इस तरफ का भी और उस तरफ का भी, हमारा परिवार करेगा ।’

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