यादें Archive

जीवन की बगिया महकेगी

यादें जब मैं और बेटे की माँ बेटे को 2011 में इंजीनियरिंग हॉस्टल में छोड़ कर लौट रहे थे, तो कार में fm पर ‘जीवन की बगिया महकेगी …’ व ‘तुझे सूरज कहूँ या

वे हमसे पहले चले गए

हम उन्हें लाने चले थे ट्रेन में ही थे 25 जून 2016 की तारीख थी सोच रहे थे कि पिताजी को अमेठी के गौरीगंज गावं से लाकर मुंबई में दवाई कराएं गे माँ ने

कुंभ की यादें

चार मई २०१६ की रात मैं, पत्नी व बेटी मुंबई से भोपाल के लिए अमृतसर एक्सप्रेस में सवार हो गए. उधर मामा मामी जी ने अमेठी से ट्रेन पकड़ी. माँ, पिताजी व मौसी जी

माँ, तब तू बहुत सुंदर लगती थी

मैं तब छोटा था. गर्मी की छुट्टी में मों, पिताजी मेरे को लेकर लखनऊ से रात की पैसेंजर गाड़ी से अमेठी गावं जाते थे. रात तीन बजे गाड़ी पहुँच जाती थी. सुबह सुबह भोर

उसको प्यार

जब जब जिंदगी की कहानी लिखूं गा तेरा नाम जरूर लिखूंगा । मैंने और बृजेश ने स्कूल व कॉलेज साथ साथ किया । कॉलेज में भी बृजेश सबसे मिलनसार हंसमुख और बातूनी था ।

हर खुशी की कीमत होती है

रूचि की यादें : फरीदाबाद शहर में मैं जिस जगह रहती हूँ वहाँ मिलता तो सब कुछ है आस-पास की दुकानों में पर बाज़ार जैसा नहीं है।बाज़ार जाने के लिए बीच रास्ते में एक

तुम प्यार हो, सच

… दूर देखो, वो जो आखिरी पेड़ दिख रहा है, उधर जाना, उसके बगल में नदी है, नदी किनारे पत्थर है, उस पत्थर पर कोई बैठा है, वो मैं हूँ, और मैं जिस को

बेटा, मैं तो चित्रगुप्त हूं

कभी-कभी कोई मज़ाक या कोई चुटकुला सुन कर दिल रो पड़ता है। हालांकि लोग चुटकुला इसलिए सुनते और सुनाते हैं कि आदमी हंसे। पर कई दफा उसमें इतना तंज होता है कि आप हंसने

मेहनत की कमाई का सुख

“संजय, ये वाली जींस भी फेंक दूं क्या?” “नहीं, एक बार सूटकेस को फिर से तोलो, क्या पता अब सूटकेस का वज़न ठीक हो गया हो।” “पर मुझे लगता है कि अभी भी सूटकेस

वो मेला होता था जिंदगी का

हमारे नाना कहते थे कि गंगा स्नान करने से सब पाप धुल जाते थे । बात पुरानी है । 1970-80 । गौरीगंज से माणिकपुर पॅसेंजर ट्रेन से नाना नानी गंगा स्नान करने जाते थे
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