यादें Archive

माते से मिलन

बात 20 अगस्त 15 की है । मैं बेटा बेटी और पत्नी दिल्ली 12 बजे पंहुचे । वहां से अगली यात्रा रात 10 बजे की थी । 10 घंटे का समय था अपने पास

हाँ देखा है मैंने

हाँ देखा है मैंने……. देहरादून के रास्ते जाते हुए उगते सुनहरे सूरज का गोला जो पेड़ों के बीच से झाँकता था मेरी ओर फिर देखा … सर पर नीला धुला आसमान ज़मीन पर बिछी

यादें – मेरे जमशेद  की 

बात 1978 की है । जुलाई की । सातवीं सिटी मोंटेसरी लखनऊ से पास कर के bvm नैनीताल में आठवीं में गए थे । नई जगह थी । नई व्यवस्था थी । नया सिस्टम

पहली बार

जब मैंने उसे पहली बार बहुत धीमे से छुआ था दिल तेजी से धड़का था और कुछ कुछ हुआ था चुप रहे, किसी को ना बताया तब कैसे क्या हुआ था जमाना, जाने कैसे

साथ रहिये और मुस्कुराइये

मेरे पति ने कुछ दिनों पहले घर की छत पर कुछ गमले रखवा दिए और एक छोटा सा गार्डन बना लिया । पिछले दिनों मैं छत पर गई तो ये देख कर हैरान रह गई

दोस्त

दोस्त वह होता है जो आप के लिए ऐसा कुछ करे कि आप जिंदगी भर याद रखें । Brijesh Singh मेरा वैसा ही दोस्त है । मेरे साथ स्कूल में था । मेरे साथ कॉलेज में

मेरे फूफा

मेरी तीन बुआ । तीनों  प्यारी । बहुत प्यारी । और तीन फूफा । एक से बढ़ कर एक । (1) सरदार जोगिंदर सिंह ….खूबियाँ इतनी कि उँगलियों पर गिननी मुश्किल … खुदा ने रंगत बख्शी

पिताजी, हम हमेशा आप पर गर्व करेंगे

मैं छोटा था, बहुत छोटा, नर्सरी में दाखिला नहीं हुआ था, गावं में रहता था, माँ, दादी और घर के दो बैल करन अर्जुन के साथ । उमर पांच साल । पिताजी शहर में

मेरी बुआ

(1) जब मैंने लिखना सीखा ‘क ‘ माँ ने सिखाया ‘क’ से कमला …कमला मतलब मेरी बुआ । तीन बुआ में सबसे बड़ी । है भी बड़ी, बड़े दिल वाली, बेहद मीठी, शूगर कैण्डी।

माँ आसूं भर रह जाएगी

माँ, तुझे छोड़ मैं शहर चला जाता हूँ, बार बार, न जाने तू कैसे रहती होगी, बाबूजी हैं, भाई है, पर मैं तो नहीं । माँ, तेरी याद में – कल फिर वही कहानी
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