Memoir Archive

माँ से मिलन

माँ से मिलन … पता था कि बेटा आज आएगा । पता तो 10 दिन पहले से था पर आज माँ का मन नहीं लग रहा था । सुबह से छत पर खड़ी राह

मुलाकात

बात 1993 की है । मैं सेंट ज़ेवियर टेक्निकल इंस्टिट्यूट माहिम में प्रोफेसर था । शादी के बाद सुल्तानपुर से मुंबई आए पत्नी रेणु को दो चार माह हुए थे । रेणु ने बताया

केवल पिताजी ही पूछते थे

केवल पिताजी ही पूछते थे – काम कैसा चल रहा है बेटा । 6 माह हो गए, सब अपनी सुनाते रहे, बिन हमारी सुने बस अपनी ही सुनाते रहे, और हम सुनते रहे ।

हर साड़ी की एक कहानी होती है

हर साड़ी की एक कहानी होती है । पत्नी जी आज साड़ियां देख रही हैं । पत्नियां 500-1000 साड़ियों में रख देती हैं, और भूल जाती हैं । भूल जाना उनकी जमा योजना का

प्रेम पत्र

प्रिये याद आ गई तुम्हारी । कैसी हो ? मुझे पता है, अपने घर में अपने पापा के साथ, अपने भैया भाभी के साथ खुश ही होगी । सुबह चाय से बिस्कुट खा कर

जीवन की बगिया महकेगी

यादें जब मैं और बेटे की माँ बेटे को 2011 में इंजीनियरिंग हॉस्टल में छोड़ कर लौट रहे थे, तो कार में fm पर ‘जीवन की बगिया महकेगी …’ व ‘तुझे सूरज कहूँ या

माँ, तब तू बहुत सुंदर लगती थी

मैं तब छोटा था. गर्मी की छुट्टी में मों, पिताजी मेरे को लेकर लखनऊ से रात की पैसेंजर गाड़ी से अमेठी गावं जाते थे. रात तीन बजे गाड़ी पहुँच जाती थी. सुबह सुबह भोर

उसको प्यार

जब जब जिंदगी की कहानी लिखूं गा तेरा नाम जरूर लिखूंगा । मैंने और बृजेश ने स्कूल व कॉलेज साथ साथ किया । कॉलेज में भी बृजेश सबसे मिलनसार हंसमुख और बातूनी था ।

बेटा, मैं तो चित्रगुप्त हूं

कभी-कभी कोई मज़ाक या कोई चुटकुला सुन कर दिल रो पड़ता है। हालांकि लोग चुटकुला इसलिए सुनते और सुनाते हैं कि आदमी हंसे। पर कई दफा उसमें इतना तंज होता है कि आप हंसने

मेहनत की कमाई का सुख

“संजय, ये वाली जींस भी फेंक दूं क्या?” “नहीं, एक बार सूटकेस को फिर से तोलो, क्या पता अब सूटकेस का वज़न ठीक हो गया हो।” “पर मुझे लगता है कि अभी भी सूटकेस
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