Poem Archive

प्रेम !

प्रेम ! तुम्हे विस्तृत आकाश और धरा के मध्य वरण किया है मेरे हृदय ने प्रेम ! उषा काल में पवित्र सूर्य किरणों के नर्म स्पर्श में अनुभूत किया है मेरी देह ने प्रेम

मुबारक ईद आयी है दुआ तो कीजिये…

यूँ तो माफीनामा हाज़िर है ले ही लीजिये, सजा कोई मुक़र्रर है तो दे ही दीजिये … खता मेरी अदा कुछ आप की भी कम न थी, ये गुस्सा छोड़ कर थोड़ा तो पानी
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