लिफ्ट में क्या हुआ

बात बहुत पर्सनल है, पर दोस्तों में क्या पर्सनल, सो बताए देते हैं ? मैं अपने स्कूल के दोस्त Anil से मिलने बड़ोदा गया । दोस्त गोरखपुर में रहते हैं । बड़ोदा आए थे । उनके बड़े बेटे, जो बड़ोदा में कार्यरत हैं, उन्हें पुत्र हुआ, मतलब दोस्त को पोता हुआ । दोस्त ने बताया कि पोते को मिलने, उसे देखने, उसके साथ खेलने, उसे दुलार करने, उसे प्यार करने … वो बड़ोदा आ रहे हैं । मेरा भी मन मचल उठा कि मैं भी दोस्त व उसके पोते से मिलूं । मैंने तपाक से बोल दिया – तुम बड़ोदा पहुंचो, मैं भी आ रहा हूं । वादा तो मैंने 12 फरवरी का किया था पर 12 को न पहुँच सका । पर जब बाल स्वरुप कन्हैया ने बुलाया था तो जाना ही था । आजकल के प्रेम दिवस, 14 फरवरी को, आदिकाल से जगत प्रेमी कान्हा को मिलने, मैं बड़ोदा पहुंच गया । बहुत आनंद आया नन्हे कान्हा को देख कर । मन प्रसन्न हो गया ।
 
कान्हा का नाम वैदिक रखा गया । मित्र वैदिक के दादा बन गए थे । अति प्रशन्न थे । दादी भी बहुत प्रसन्न थी । नानी भी वहां थी । बहुत खुश । सभी अपनी खुशी प्रकट कर रहे थे । खुशी में कोई मुझे मेवा खिला रहा था, कोई मिठाई खिला रहा था, कोई फल । उसी से पेट भर गया । उसके ऊपर भोजन । दादी व नानी ने मिलकर भोजन बनाया था । बहुत स्वादिष्ट । लाजबाब । हमारी मुम्बइया भाषा में – मस्त ? भोजन खतम भी नहीं हुआ कि फिर से मिठाई शुरू हो गई । मैंने कहा कि भाभी अब बस करो, मेरा पेट फट जाएगा, पर न भाई माना न भाभी ??
 
बातें बातें बातें । तब की बातें, अब की बातें । आज की बातें, कल की बातें । भावुक बातें, अति भावुक बातें ।
 
बड़ा बेटा व बहू, नए नए मम्मी पापा, बहुत प्यारे लगे । संस्कार व सेवा भाव से भरे बच्चे । चलते चलते छोटा बेटा भी मिल गया । छोटा बेटा अब छोटा नहीं है, अनिल भाई का व्यवसाय संभालता है, बहुत अच्छे से । बड़ा हो गया है, शादी करने लायक हो गया है ? मुझसे कहता है – अंकल, आप से जब नैनीताल में मिला था, तब से आपका फैन हो गया हूँ ? अब मैं क्या बताऊं लल्ला, तुम कितने अच्छे हो, तुमसे मिल के मैं गदगद हो गया ?
 
चलने लगा तो सभी भावुक हो उठे । मित्र तो अति भावुक हो उठा । बोला – अरुण, तुम आए, मेरी छाती चौड़ी हो गई ।
 
लिफ्ट में, मैं और मित्र थे । मित्र गले लगा कर अति भावुक हो गया । दिल भर आया । आंखें भर आई । गला रूंध गया । बहुत कुछ बोलना चाहता था । बोल नहीं पाया । मैंने इशारा किया । मत बोलो भाई, मैं सब समझ गया ??
 
अरुण


चलते चलते  

बड़ोदा में अपने मित्र Anil Dua के नवजात पोते ‘वैदिक’ से मिल कर जो प्रेम मिला वह असली प्रेम था, अदभुत था, सुखद था, आनंदमयी था, ईश्वरीय था.

इससे अच्छी 14 फरवरी नहीं हो सकती ??

अरुण