ये कैसी सफलता

बदलती परिभाषाएं

पहले
सफलता = (पढ़ाई करना, नौकरी करना, काम करना, कमाना, घर परिवार की देखरेख करना, दादा दादी की सेवा करना, माता पिता की सेवा करना)

अब
सफलता = (बहुत ऊंची पढ़ाई करना, बहुत जादा सैलरी वाली नौकरी करना, विदेश में नौकरी करना, वहीं शादी कर लेना या यहाँ शादी करके वहाँ ले जाना, वहीं बच्चे हो जाना, उनको वहीं पढ़ाना, वहीं सेटल हो जाना)

इस बदलती परिभाषा से हमें कोई आपत्ति नही है । चिंता जरूर है । चिंता केवल इस बात से है कि इस नई परिभाषा में दादा दादी, माता पिता, परिवार कहीं छूट जा रहा है, कई बार माता पिता अकेले जिंदगी जी रहे हैं, बहुतै अकेले ।

अग्रवाल जी का यहाँ कोई नही है । बेटा लंदन से पैसे डायरेक्ट नर्सिंग होम को भेज देता है । पिताजी पिछले 6 माह से वहीं हैं । अब वह नर्सिंग होम उनका होम बन गया है ।

पांडे जी वृद्धा आश्रम में पिछले 2 साल से हैं । उनका बेटा कनाडा में है । बहुत पैसा है । बढ़िया वाला सुख सुविधा वाला old age home करवाया है अपने पिताजी को । पर पिताजी दुखी हैं । दुख यह है कि जिसको पैदा किया, पाला पोसा, बड़ा किया, … वह पास नही है ।

बदलती परिभाषा ने पहले वृहत परिवार या जॉइंट फैमिली कांसेप्ट को समाप्त किया और अब फैमिली कांसेप्ट को समाप्त कर रही है ।

काठगोदाम से लखनऊ ट्रेन से आ रही थी । सामने बैठे श्रीवास्तव जी कह रहे थे – गलती हमारी है, हम अपने बच्चों से बहुत जादा पढ़ाई, ऊंचा ओहदा, ऊंची नौकरी, ऊंची सैलरी, ऊंची जगह, … चाहते हैं । वो यह सब करते करते माउंट एवरेस्ट पर पहुंच जाता है, वहां वह अपने को अकेला पाता है और यहां हम अपने को अकेला पाते हैं ।

हम अपने बच्चों को ऊंचाई या सफलता या कैरियर का सही अर्थ नही समझा पा रहे हैं, यह हमारी विफलता है ।

चिंतन ?