यादें Archive

मुलाकात

बात 1993 की है । मैं सेंट ज़ेवियर टेक्निकल इंस्टिट्यूट माहिम में प्रोफेसर था । शादी के बाद सुल्तानपुर से मुंबई आए पत्नी रेणु को दो चार माह हुए थे । रेणु ने बताया

केवल पिताजी ही पूछते थे

केवल पिताजी ही पूछते थे – काम कैसा चल रहा है बेटा । 6 माह हो गए, सब अपनी सुनाते रहे, बिन हमारी सुने बस अपनी ही सुनाते रहे, और हम सुनते रहे ।

ये मेरे हो गए

2016 के दिसंबर माह में कोलकाता से अपनी पत्नी के साथ लौटते वक्त ट्रेन में एक प्यारे से जोड़े की खूबसूरत जोड़ीदार से मैंने यूं ही पूछ लिया – ‘आप को इतना सीधा सादा

प्यार तुम्हे अवनीश

बात 2012 की है. एक लड़का था, अवनीश सिंह. कंप्यूटर इंजीनियरिंग का स्टूडेंट था. शारदा यूनिवर्सिटी में. फेसबुक पर कुछ कुछ लिखता था. लिखता अच्छा था. एक दिन मैंने देखा कि वो उलझन में

कोलकाता यात्रा

कोलकाता यात्रा  कोलकाता शहर में साफ सफाई दिखी । होर्डिंग, बैनर व पोस्टर बहुत कम दिखे । जो भी पोस्टर वगैरा दिखे वो दीदी के थे । दीदी के अलावां किसी और की फोटो

हर साड़ी की एक कहानी होती है

हर साड़ी की एक कहानी होती है । पत्नी जी आज साड़ियां देख रही हैं । पत्नियां 500-1000 साड़ियों में रख देती हैं, और भूल जाती हैं । भूल जाना उनकी जमा योजना का

प्रेम पत्र

प्रिये याद आ गई तुम्हारी । कैसी हो ? मुझे पता है, अपने घर में अपने पापा के साथ, अपने भैया भाभी के साथ खुश ही होगी । सुबह चाय से बिस्कुट खा कर

जीवन की बगिया महकेगी

यादें जब मैं और बेटे की माँ बेटे को 2011 में इंजीनियरिंग हॉस्टल में छोड़ कर लौट रहे थे, तो कार में fm पर ‘जीवन की बगिया महकेगी …’ व ‘तुझे सूरज कहूँ या

वे हमसे पहले चले गए

हम उन्हें लाने चले थे ट्रेन में ही थे 25 जून 2016 की तारीख थी सोच रहे थे कि पिताजी को अमेठी के गौरीगंज गावं से लाकर मुंबई में दवाई कराएं गे माँ ने

कुंभ की यादें

चार मई २०१६ की रात मैं, पत्नी व बेटी मुंबई से भोपाल के लिए अमृतसर एक्सप्रेस में सवार हो गए. उधर मामा मामी जी ने अमेठी से ट्रेन पकड़ी. माँ, पिताजी व मौसी जी