यादें Archive

माँ, तब तू बहुत सुंदर लगती थी

मैं तब छोटा था. गर्मी की छुट्टी में मों, पिताजी मेरे को लेकर लखनऊ से रात की पैसेंजर गाड़ी से अमेठी गावं जाते थे. रात तीन बजे गाड़ी पहुँच जाती थी. सुबह सुबह भोर

उसको प्यार

जब जब जिंदगी की कहानी लिखूं गा तेरा नाम जरूर लिखूंगा । मैंने और बृजेश ने स्कूल व कॉलेज साथ साथ किया । कॉलेज में भी बृजेश सबसे मिलनसार हंसमुख और बातूनी था ।

हर खुशी की कीमत होती है

रूचि की यादें : फरीदाबाद शहर में मैं जिस जगह रहती हूँ वहाँ मिलता तो सब कुछ है आस-पास की दुकानों में पर बाज़ार जैसा नहीं है।बाज़ार जाने के लिए बीच रास्ते में एक

तुम प्यार हो, सच

… दूर देखो, वो जो आखिरी पेड़ दिख रहा है, उधर जाना, उसके बगल में नदी है, नदी किनारे पत्थर है, उस पत्थर पर कोई बैठा है, वो मैं हूँ, और मैं जिस को

बेटा, मैं तो चित्रगुप्त हूं

कभी-कभी कोई मज़ाक या कोई चुटकुला सुन कर दिल रो पड़ता है। हालांकि लोग चुटकुला इसलिए सुनते और सुनाते हैं कि आदमी हंसे। पर कई दफा उसमें इतना तंज होता है कि आप हंसने

मेहनत की कमाई का सुख

“संजय, ये वाली जींस भी फेंक दूं क्या?” “नहीं, एक बार सूटकेस को फिर से तोलो, क्या पता अब सूटकेस का वज़न ठीक हो गया हो।” “पर मुझे लगता है कि अभी भी सूटकेस

वो मेला होता था जिंदगी का

हमारे नाना कहते थे कि गंगा स्नान करने से सब पाप धुल जाते थे । बात पुरानी है । 1970-80 । गौरीगंज से माणिकपुर पॅसेंजर ट्रेन से नाना नानी गंगा स्नान करने जाते थे

माते से मिलन

बात 20 अगस्त 15 की है । मैं बेटा बेटी और पत्नी दिल्ली 12 बजे पंहुचे । वहां से अगली यात्रा रात 10 बजे की थी । 10 घंटे का समय था अपने पास

हाँ देखा है मैंने

हाँ देखा है मैंने……. देहरादून के रास्ते जाते हुए उगते सुनहरे सूरज का गोला जो पेड़ों के बीच से झाँकता था मेरी ओर फिर देखा … सर पर नीला धुला आसमान ज़मीन पर बिछी

यादें – मेरे जमशेद  की 

बात 1978 की है । जुलाई की । सातवीं सिटी मोंटेसरी लखनऊ से पास कर के bvm नैनीताल में आठवीं में गए थे । नई जगह थी । नई व्यवस्था थी । नया सिस्टम