कहानी Archive

बेटा, मैं तो चित्रगुप्त हूं

कभी-कभी कोई मज़ाक या कोई चुटकुला सुन कर दिल रो पड़ता है। हालांकि लोग चुटकुला इसलिए सुनते और सुनाते हैं कि आदमी हंसे। पर कई दफा उसमें इतना तंज होता है कि आप हंसने

मेहनत की कमाई का सुख

“संजय, ये वाली जींस भी फेंक दूं क्या?” “नहीं, एक बार सूटकेस को फिर से तोलो, क्या पता अब सूटकेस का वज़न ठीक हो गया हो।” “पर मुझे लगता है कि अभी भी सूटकेस

शादी का लंहगा

मेरी पत्नी ने मुझे बताया कि उसे जयपुर जाना है। “अचानक जयपुर क्यों?” “सलोनी की शादी तय हो गई है, इसलिए।” “तो, क्या सलोनी की शादी जयपुर में है?” “नहीं बाबा, शादी में पहनने

कहाँ गये वो रिश्ते

हमारे घर से बाज़ार की दूरी कुल सौ मीटर होगी। मां शाम को सब्जी लेने जाती, तो मुहल्ले की चार महिलाएं साथ होतीं। घर में कभी किसी की जरा तबीयत खराब होती, तो दूर-दूर

तू बहन हमारी है, सबसे प्यारी है

दुनिया की मेरी सारी बहनो के लिए –   धागा तू बांध पाए या नहीं मन का धागा बंधा हुआ है तेरे प्यार दुलार में बहना एक एक मोती गुथा हुआ है तू खुश

अगर मैं कवी होता

अगर मैं कवी होता तो कविता लिखता नदी पे लिखता हवा पे लिखता बच्चों पे लिखता युवा पे लिखता धरती का, दुलार लिखता आसमां का, प्यार लिखता लिखता उसकी, आंखे गीली लिखता खेत की,

पिज्जा – आठ टुकड़े खुशियों के

पत्नी ने कहा – आज धोने के लिए ज्यादा कपड़े मत निकालना… पति- क्यों?? उसने कहा..- अपनी काम वाली बाई दो दिन नहीं आएगी… पति- क्यों?? पत्नी- गणपति के लिए अपने नाती से मिलने

पिताजी, हम हमेशा आप पर गर्व करेंगे

मैं छोटा था, बहुत छोटा, नर्सरी में दाखिला नहीं हुआ था, गावं में रहता था, माँ, दादी और घर के दो बैल करन अर्जुन के साथ । उमर पांच साल । पिताजी शहर में

कैसे बना शिक्षक ?

इंजीनियरिंग करने के बाद एक छोटी से नौकरी कर रहा था. Software programmer था । एक दिन हेगड़े साहब ऑफिस आए । बात बात में बोले – अरे अरुण, तुमने तो Pascal programming पढ़ा

और, मैं उनमे समा गई, हमेशा के लिए !

कितने बरस बीत गए इस बात को … ये कैसी सब्जी उठा लाये आप ? आपको तो खरीदारी की ज़रा सी भी अक्ल नहीं है | बस .. इतना कहना था कि घर में